हर दिन रात सुबहों शाम भजहु रे मन निताइ नाम

१)हर दिन रात सुबहों शाम
भजहु रे मन निताइ नाम

जन्म जन्म के हम अपराधी
पाप अनर्थ का बोझ है भारी
निताइ बिना इन्हें कौन मिटाए
प्रभु तुम बिना हमें कौन बचाए

२) पालक तुम हो, उद्धारक तुम हो
भव बंधन संघारक तुम हो
जीवों के प्रतिपालक तुम हो
ह्रदय में स्थित परमात्मा तुम्हीं हो

अखिला ब्रह्माण्ड तुम में ही समाया
नाम तुम्हारा जगत उजियारा

३) तुम्हारे समान ना है कोइ दाता
करूणामय प्रभु प्रेम विधाता
दोष न ले, निताइ, योग्यता ना तोले
सबको प्रेम बाँटें दो कर जोरे

बिन देखे जो प्रेम लुटाए
एैसे प्रभु को कौन ठुकराए?

४) एक भी बार जो निताइ को पुकारे
ह्रदय से लगाने आए धाय धाय
दयाल निताइ सबसे है प्यारे
सबके मन पल भर मैं चुरा

श्री गुरू चरण सरोज पखारे ये
दासी अधम निताइ गुण गावे

रचना – नीताइ सेविका दासी

निताइ विलक्षण करूणा तुम्हारी!!

१) निताइ, विलक्षण करूणा तुम्हारी
गौर प्रेम प्रभु तुम ले आए
भक्ति में जग को डुबाए

२) दुरजन के प्रभु तुम परिऋाता
गौर रस प्रेम प्रदाता
निताइ विलक्षण करुणा तुम्हारी

३) प्रेम जाल चाहु और बिछाई
मुग्ध रहे सुर नर नारी
निताइ विलक्षण करुणा तुम्हारी

४) नीच अधम के पिछे भागे
युगल पद सेवा दिलाई
निताइ विलक्षण करुणा तुम्हारी

५) नित्य बध को भक्ति सिखायो
क्षण में भागवत बनायो
निताइ विलक्षण करुणा तुम्हारी

६) निज सेवक के चरण सिरधारी
भुल गए थाकुराइ
निताइ विलक्षण करुणा तुम्हारी

७) निज घातक को गले से लगाए
गौर पद दास बनाए
निताइ विलक्षण करुणा तुम्हारी

८) केवल मात्र आश्रय तुम हमारे
नाथ तुम ही आश्रय हमारे
राखो चरण तीहारी
निताइ विलक्षण करुणा तुम्हारी

रचना : निताइसेविका दासी